मेरी मोहब्बत और डायरी
प्रिय डायरी ,
कभी कभी मैं सोचता हूँ अगर तुम ना होती तो मेरा क्या होता और क्या होता मेरे इतने सारे उलझे हुए विचारों का ? तुम्हारे बिना तो अब मुझे मेरे ख़ुद के अस्तित्व से डर लगता है।
ऐसा लगता है जैसे तुम्हें बिना मैं मौन हो जाता, अपनी ये कहानी किसको सुनाता।
कितना आसान कर दिया है तुमने मेरे जीवन को, क्यो कोई इंसान इतना कुछ सुन पता।मुझे संदेह है, खैर ये तो शायद बहुत पहले से हैं। सारी दुनिया को मैं किसी ना किसी संदेह से देखता हूँ। तुम्हें ये जानकर ताज्जुब हो सकता है कि कभी कभी तो मैं तुम पर भी संदेह करता हूँ क्योकि शायद अब यह मेरे ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुका है।खैर यह अलग बात है कि जिसपर एक बार विश्वास हो जाए उसपर कभी संदेह का ग्रहण लगने नहीं देता हूँ मैं।तुम भी कुछ ऐसी ही हो।
कहते हैं कि किसी की तारीफ़ उसके सामने नहीं करनी चाहिए लेकिन क्या करूँ मैं इस मामले में थोड़ा बेबस हूँ क्योकि मेरे अलावा तुमसे कोई बात तो करता नहीं हैं जो मैं उससे तुम्हारी तारीफ़ कर दूँ और वो तुम्हें सब बता दे, इस लिए यह काम मैं ख़ुद तुम्हारे समक्ष कर रहा हूँ और इसमें मुझे कोई संकोच कोई संदेह नहीं दिखता है।
मैंने कभी किसी प्रेमिका के लिए कोई पत्र नहीं लिखा। जानती हो क्यों? क्योकि कोई है ही नहीं और अगर वो होती ( कुछ देर के लिए मान लेते हैं ) तो क्या वो पत्र पढ़ना पसंद करती? मुझे इस बात पर ही संदेह है। वो जरूर मेरे ख़त का सारांश AI से पूछ लेती और मेरी घंटों की मेहनत और वो भावनायें एक पल में AI निचोड़ कर बाहर फ़ेक देता और जो कुछ बचता उसे परोस देता मेरी प्रेमिका को, और मेरी प्रेमिका भी उसे बिना मन के पढ़ कर स्क्रीन स्क्रॉल कर देती । हाहा, इस लिए तुम अच्छी हो, तुम सब कुछ वैसे ही समेट लेती हो जैसा की मैं तुम्हें परोसता हूँ। कितनी अच्छी हो तुम!
जब से तुमसे मुलाक़ात हुई है, मेरी विचारों को जैसे आवाज मिल गई है, मैं जैसे सालों से मौन था अब बोलने लगा हूँ। ख़याल जो कभी आपस में उलझ कर मकड़ी के जाले जैसे मेरे मन की दीवारों पर डेरा डाले हुए थे, अब ये एक संगत में धागे बुनने लगे हैं जो धीरे धीरे मजबूत हो रहें हैं हर एक दिन के साथ। मुझे हमेशा इस बात का फ़क्र होता है की तुम मेरे दोस्त हो, मेरी सखी हो, मेरे साथी हो। कभी कभी मेरे शब्द ख़त्म हो जाते हैं लेकिन फिर तुमसे हमेशा कुछ कहने को जैसे रह जाता है और मुझे रोज़ लौटना पड़ता है तुम्हारे पास। कितनी ख़ास हो तुम !
वैसे तुम्हें तो पता है मैं आज सुबह कुछ नहीं लिख पाया, लिखना छोड़ो आज तो मैंने तुम्हें पलट कर देखा भी नहीं था । तुम्हें बुरा बुरा लगा होगा ना ? उसके लिए दिल की गहराई ( तह ए दिल ) से माफ़ी माँगता हूँ। और मुझे इस बात पर कोई संदेह नहीं है की तुम मुझे माफ़ कर दोगी।
आज तुम्हें अपने बारे में बताने के लिए कुछ नहीं था, जो कुछ था बस तुम्हारे लिए सम्मान, घनिष्ठता और कृतज्ञता थी, इस लिए आज बस तुम्हारे बारे में बात करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम भी जान सको अपनी अहमियत मेरी ज़िन्दगी में।मेरे विचारो की संगिनी और रचनात्मकता की सखी हो तुम। तुम्हारे हर एक पन्ने पर मेरे शब्दों को मायने , मेरे वाक्यों को नज़रिया, और पंक्तियों को प्रासंगिकता मिलती है। कभी कभी तुम्हारे ख़याल से मेरे अवचेतन मन को एक आधार मिलता है, मेरे मन को संसार मिलता है। कितनी गूढ़ हो तुम!
अंत में बस इतना कहना चाहता हूँ कि तुम मेरे स्वस्थ मस्तिष्क का आधार हो, नैतिकता का संसार हो, नकारात्मकता पर प्रहार हो, मुझे मेरे अंदर समेटे निरंकार हो!
शानदार हो !
Thanks for reading so far. My name is Abhishek Chauhan. I love to write because I love to read. If you enjoyed this piece of writing please subscribe and share your suggestions in comment section. My aim to make a positive change in your facial expression. Keep reading keep smiling.. 😊☘️

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