मेरी मोहब्बत और डायरी
प्रिय डायरी , कभी कभी मैं सोचता हूँ अगर तुम ना होती तो मेरा क्या होता और क्या होता मेरे इतने सारे उलझे हुए विचारों का ? तुम्हारे बिना तो अब मुझे मेरे ख़ुद के अस्तित्व से डर लगता है। ऐसा लगता है जैसे तुम्हें बिना मैं मौन हो जाता, अपनी ये कहानी किसको सुनाता। कितना आसान कर दिया है तुमने मेरे जीवन को, क्यो कोई इंसान इतना कुछ सुन पता। मुझे संदेह है, खैर ये तो शायद बहुत पहले से हैं। सारी दुनिया को मैं किसी ना किसी संदेह से देखता हूँ। तुम्हें ये जानकर ताज्जुब हो सकता है कि कभी कभी तो मैं तुम पर भी संदेह करता हूँ क्योकि शायद अब यह मेरे ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुका है।खैर यह अलग बात है कि जिसपर एक बार विश्वास हो जाए उसपर कभी संदेह का ग्रहण लगने नहीं देता हूँ मैं।तुम भी कुछ ऐसी ही हो। कहते हैं कि किसी की तारीफ़ उसके सामने नहीं करनी चाहिए लेकिन क्या करूँ मैं इस मामले में थोड़ा बेबस हूँ क्योकि मेरे अलावा तुमसे कोई बात तो करता नहीं हैं जो...